सोमवार, 4 जून 2012

कंगाल

इस अँधेरे को चिरुं  कैसे
इस ख़ामोशी को काटूँ कैसे
इतना दर्द समाये समता नहीं
इतनी पीड़ा आवाज़ निकलती नहीं
सूने  घर की चार दिवारी में
कलेजा फटता है किसी ग़रीब का
ज़िन्दगी के कारोबार में
हम ही पीछे रह गए क्यों
दुनियादारी निबाही इतनी
कि कंगाल हुई हस्ती अपनी
जिस आंगन में गुज़रते थे
बहुतों के सुबह-शाम
झांकता नहीं कोई अब
भंडार ख़ाली हुआ जिस दाम 
कदमों की आहट
भूले से भी आती नहीं अब
कह कहे गूंजते थे हर पल जहाँ
सब निकल पड़े मंजिलों पे अपनी
हम ही क्यों न ढूंढ सके राह अपनी
नोन-तेल-लकड़ी के जंजाल में
क्यों रह गयीं आर्जूंएं  दबीं
नाकामयाबी झटक न सके
किसी ग़रीब की मुहब्बत की तरह
बस येही अँधेरा, येही ख़ामोशी
लूट ले गए रौशनी सभी

शनिवार, 12 मई 2012

औरत

ईश्वर में समा जाऊं 
मैं मैं न रहूँ 
ये शरीर न रहे 
ये अस्तित्व न रहे 
मेरा कुछ भी न रहे 
ताकि तुम मुझे 
छू न सको 
मेरे स्वाभिमान को 
कुरेद न सको
मेरी आत्मा का 
बलात्कार न हो 
तुम जो हक़ 
समझते हो अपना 
मेरे व्यक्तित्व को 
सम्पति अपनी 
मैं हूँ ही नहीं 
न तुम्हारी
न किसी की 


बुधवार, 18 अप्रैल 2012

बंदिशें

काश की मुहब्बत
में बंदिशें न होती
ज़माने की दीवारें न होती
उंच नीच की दरारें न होतीं
काश की हर रिश्ते को
नाम की ज़रुरत न होती
दो इंसानों के बीच
मुहब्बत ही काफी होती
नफरत भरी दुनिया में
ग़र मिल जाती
दो घड़ी को जन्नत
झुलसी हुई ज़िन्दगी को
सावन की बौछार मिल जाती
कट जाती उम्र
इक लम्हे के सहारे
वक़्त के फफोलों को
ठंडक मिल जाती

सलाखें

हर सुबह के साथ
जाग उठता है
सीने में उम्मीद का
सोया पंछी
पंख फड फाड़ता है
गर्दन उठता है
उड़ान भरना चाहता है
मगर दरवाजें हैं बंद
पिंजरे की सलाखें तंग
हाथ बढ़ा कर भी
आसमान छू सकता नहीं
गहरी सांस भर कर भी
हवा सूँघ सकता  नहीं
सन्देश जब भेजा ही नहीं
मुझ तक पंहुंचता कैसे
रिहाई का पैगाम
कोई आता ही नहीं
जीवन रेखा की लम्बाई देख  
शिथिल हो उठता है दिल
इतनी गिनती आती नहीं
समां जाए तमाम दिन
अधूरी प्यास लिए
छट पटाता, फड फाड़ता
ये बेनाम पंछी यूँही
दम तोड़ देगा एक दिन

मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

माँ


माँ आज तू सोती है और हम जागते हैं
कभी हम सोते थे और तू जगती थी
हलके से पीठ थप थपाती थी
और मीठी लोरी सुनाती थी
आज हम कितनी आवाजें देते हैं
और तुझे ज़ोर ज़ोर से हिलाते हैं
मगर तू पलक तक झपकाती नहीं
तेरे सिरहाने आस लगाये तकते हैं
अब भी तुझ में जीवन हैं यही ढूँडते रहते हैं
शायद तू टूटे दांतों से फिर मुस्कुरा देगी 
और डांट के हमे फिर से गले लगा लेगी
मगर माँ तू तो शिथिल, निशब्द सोती है
किसी और ही दुनिया में लगती है
माँ तुझे यूँ असमर्थ देखा जाता नहीं
तू लाचार हो जाए यह स्वीकार नहीं
आज तू अपने से करवट तक ले सकती नहीं
और देह की  क्रियाओं को रोक सकती नहीं
तेरे पीठ के घाव हमारे सीने पे चुभते हैं
क्यों निर्मम है तेरा ईश्वर खुद से पूछते हैं
माँ क्यों ये सब होता है
जो पेड़ हमे साया देता है
वही उजाड़ हो जाता है
जो उँगलियाँ चलना सिखाती हैं
वही हाँथ छुड़ा लेती हैं
जो आँचल सब से बचाता है
वही सिमट लुप्त हो जाता है

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

तकाज़ा



मेरे हर आज से करते हो

गुज़रे कल का तकाज़ा
मेरे होश से मांगते हो

मेरे जुनून का हिसाब

अपनी हस्ती को मिटा कर भी

कर न सके दरिया-ऐ-इन्तहा पार

मेरे न होने से पूछते हो
मेरी होनी का हिसाब

कौन कहता है कि वक़्त

घावों को भरता नहीं
गर नए नश्तर न खरोंचे
पुराने ज़ख्मों को बार बार

बुझी आग में सुलगती रहे
चिंगारी जब तक

न छेड़ो भड़क सकती है

आग यक ब यक
जिस गरीब ने लुटा दी उम्र
जिगर के टुकड़े बटोरने में
तोहमत है आज उसी पर
खज़ाना-ऐ-उल्फत लुटाने का
ज़माने के जब कर्जदार ही नहीं

क्या चुकाना, क्या निबाहना
जो पाया वही दिया
बेवफाई
बेइंसाफी

शनिवार, 22 अक्टूबर 2011

थक गया दिल तुम्हारा



धड़कते धड़कते, आखिर थक ही गया दिल तुम्हारा

चलते चलते, आखिर थम ही गया दिल तुम्हारा

एक पुर्जे की तरह रुकना ही था उसे

रफ़्तार से बहुत तेज़ जो चल रहा था

ये मैं नहीं , वो मशीन बता रही थी

जो तुम्हारे सिरहाने, खामोश लगी थी

हम टकटकी बांधे, उसी को देखते थे

तुम अभी हो, जान कर सुकून पाते थे

मगर जिस घडी दिल ने तुम्हारे जवाब दिया

लकीरें सपाट हो गयीं , चेहरा शांत हो गया

शिकन माथे से गायब हो गयी

तुम्हे जैसे निजात मिल गयी

क्या हश्र किया था तुम्हारा, दवा के ठेकेदारों ने

और हमारी तुम्हे जिंदा रखने की कोशिषों ने

सुईयों से तुम्हारी हर नस खुबो रखी थी

और खुराक के नामपे ट्यूब चढ़ा रखी थी

तुम्हारी बदहवासी की हालत में

जो जी चाह किया बेरेह्मों ने

और हम, सिर्फ हाथ मलते रहे

तुम्हारी एक झलक पाने के लिए

दरबानो से मिन्नतें करते रहे

मगर क्या पहरा था उन दरवाज़ों पे

भीक मांगके भी उन्हें लांघ न सके

आखिर मर्ज़ ने ज़िन्दगी को हरा दिया

और तुम ने जहां को अलविदा कह दिया