निकले थे जहाँ से
उन्हीं वीरानियों में लौट आए
खोजते हुए आबादी
उन्हीं उदासियों में लौट आए
उठाये थे कदम
मंजिलों की तरफ़
हाय गुमशुदा हम
उसी दोराहे पे लौट आए
दोस्तों की तालाश में
मयखाने पहुँच गए थे
काँधा ढूँड ते
तेरे दर पे लौट आए
आसमान छूने को
पंख पसारे थे हमने
दामन में कुछ खार
कुछ ज़र्रे बटोर लाये
बेडियों को झटक कर
बढाये थे कदम हमने
दर्द ने नाता न तोडा
सलाखों में लौट आए
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बुधवार, 30 सितंबर 2009
सोमवार, 21 सितंबर 2009
सन्नाटे
ज़िन्दगी के सन्नाटे गूंजते हैं
रात की अँधेरी सड़कों से
गश्त लगाती हुई लाठियों के साथ
लावारिस कुत्तों के भौंकने के साथ
बस्तियों से थकी साँसों की बू आती है
गलियों से तनहा रूहों की चीखों के साथ
शहर सो गया दिन के झग-झोर के बाद
मुझे नींद आती नहीं क्यों करवटों के बाद
ज़मानें भर की बेवफ़ाइयां
एक एक याद आतीं रहीं
हजारों जानने वालों में
एक दोस्त याद आता नहीं
आधी उम्र जो गुज़र चुकी है अपनी
एवाज़ में दिखने को कुछ नहीं
क्या यही है ज़िन्दगी अपनी
यही हस्ती, यही बलंदी अपनी
सुबह से शाम का हो जाना
मेरी उम्र का तमाम हो जाना
रात की अँधेरी सड़कों से
गश्त लगाती हुई लाठियों के साथ
लावारिस कुत्तों के भौंकने के साथ
बस्तियों से थकी साँसों की बू आती है
गलियों से तनहा रूहों की चीखों के साथ
शहर सो गया दिन के झग-झोर के बाद
मुझे नींद आती नहीं क्यों करवटों के बाद
ज़मानें भर की बेवफ़ाइयां
एक एक याद आतीं रहीं
हजारों जानने वालों में
एक दोस्त याद आता नहीं
आधी उम्र जो गुज़र चुकी है अपनी
एवाज़ में दिखने को कुछ नहीं
क्या यही है ज़िन्दगी अपनी
यही हस्ती, यही बलंदी अपनी
सुबह से शाम का हो जाना
मेरी उम्र का तमाम हो जाना
शुक्रवार, 21 अगस्त 2009
वास्ता
तेरे शेहेर में रहते हैं हम आज भी
मगर तुझे याद ही नहीं
तेरी गलियों से आतीं हैं राहें मेरे दर तक
मगर तुझे याद ही नहीं
मेरे कूंचे से गुज़र जाता है तू
मगर बिन सलाम किए
तेरे पाये-चाप को पहचानती हूँ आज भी
मगर तुझे याद ही नहीं
खुदा का वास्ता ले कर
तरके-मुहब्बत की थी हमने मगर
दिल कम्बख्क्त तेरा है आज भी
मगर तुझे याद ही नहीं
किसी गैर के पहलु में
तेरा सर क्यूँ कर हो बेवफा
मैं भी तोह हूँ दामन बिछाए
मगर तुझे याद ही नहीं
सावन फिर से लौटा है मेरे आँगन में
मगर मैं कहाँ और तू कहाँ
भीगी हवाओं से भड़क उठती है आग
मगर तुझे याद ही नहीं
मिल जाता है जब, गैरों की मौजूदगी में
गुज़र जाता है कतरा कर
हर सुबह -शाम गुज़ारी थी हमने साथ साथ
मगर तुझे याद ही नहीं
वक्त जो गुज़ारे थे हमने
क्या उनका ज़रा भी तकाज़ा नहीं
सजा राखी है मैंनेसेज आज भी
मगर तुझे याद ही नहीं
तेरी फितरत ही थी आशिकाना, तू करता क्या
मगर मैंने तोह ईबादत की थी
तुझे याद ही नहीं
किसी अपने से पूछ लेता मेरे हमसफ़र
मेरे घर का पता
तेरे नाम से जानते हैं मुझे आज भी
सिर्फ़ तुझे याद नहीं
मगर तुझे याद ही नहीं
तेरी गलियों से आतीं हैं राहें मेरे दर तक
मगर तुझे याद ही नहीं
मेरे कूंचे से गुज़र जाता है तू
मगर बिन सलाम किए
तेरे पाये-चाप को पहचानती हूँ आज भी
मगर तुझे याद ही नहीं
खुदा का वास्ता ले कर
तरके-मुहब्बत की थी हमने मगर
दिल कम्बख्क्त तेरा है आज भी
मगर तुझे याद ही नहीं
किसी गैर के पहलु में
तेरा सर क्यूँ कर हो बेवफा
मैं भी तोह हूँ दामन बिछाए
मगर तुझे याद ही नहीं
सावन फिर से लौटा है मेरे आँगन में
मगर मैं कहाँ और तू कहाँ
भीगी हवाओं से भड़क उठती है आग
मगर तुझे याद ही नहीं
मिल जाता है जब, गैरों की मौजूदगी में
गुज़र जाता है कतरा कर
हर सुबह -शाम गुज़ारी थी हमने साथ साथ
मगर तुझे याद ही नहीं
वक्त जो गुज़ारे थे हमने
क्या उनका ज़रा भी तकाज़ा नहीं
सजा राखी है मैंनेसेज आज भी
मगर तुझे याद ही नहीं
तेरी फितरत ही थी आशिकाना, तू करता क्या
मगर मैंने तोह ईबादत की थी
तुझे याद ही नहीं
किसी अपने से पूछ लेता मेरे हमसफ़र
मेरे घर का पता
तेरे नाम से जानते हैं मुझे आज भी
सिर्फ़ तुझे याद नहीं
बुधवार, 29 अप्रैल 2009
किस्सा
कहते हो किस्सा ख़त्म हो चला
हमारे बीच अब कुछ न रहा
तेरी जुबां का कहना है ये
मगर नज़रे बयान कुछ और
तू मुझसे महरूम हुआ नही कभी
अपनी मुहब्बत पर भरोसा है अभी
मेरे करीब आने से भी डरता है तू
बेकरारी नज़रों में छुपाये फिरता है तू
अपने जज्बों पे यकीं नही तुझको
मैं दिल की धड़कन न सुन लूँ डरता है तू
मेरी साँसों के चलने से लगती है आग तुझे
मैं कैसे मान लूँ ये किस्सा ख़त्म हो चला है
शराफत तेरी बुजदिली का सिला तो नहीं
मुझसे न सही ख़ुद से सच बोल ले कभी
ये बार-बार उखड के वापस आना तेरा
तेरी बेचैनी का अफसाना है कह रहा
मुहब्बत को मेहेरबानी का पैराहन न दीजिये
अब भी हम तेरे कुछ लगते हैं मान लीजिये
हमारे बीच अब कुछ न रहा
तेरी जुबां का कहना है ये
मगर नज़रे बयान कुछ और
तू मुझसे महरूम हुआ नही कभी
अपनी मुहब्बत पर भरोसा है अभी
मेरे करीब आने से भी डरता है तू
बेकरारी नज़रों में छुपाये फिरता है तू
अपने जज्बों पे यकीं नही तुझको
मैं दिल की धड़कन न सुन लूँ डरता है तू
मेरी साँसों के चलने से लगती है आग तुझे
मैं कैसे मान लूँ ये किस्सा ख़त्म हो चला है
शराफत तेरी बुजदिली का सिला तो नहीं
मुझसे न सही ख़ुद से सच बोल ले कभी
ये बार-बार उखड के वापस आना तेरा
तेरी बेचैनी का अफसाना है कह रहा
मुहब्बत को मेहेरबानी का पैराहन न दीजिये
अब भी हम तेरे कुछ लगते हैं मान लीजिये
सोमवार, 24 मार्च 2008
गर्द
गर्द उड़ती है आज वहां
तेरा आशियाँ था जहाँ
वो जहाँ जो तुने संवारा था
वो दुनिया जो तुने बनाई थी
आज तेरा नाम-औ-निशान तक नहीं
तेरे तारीख़ से कोई वाकिफ नहीं
कोई तुझे पहचानता नहीं
तेरी याद को इक लम्हा नहीं
वो गलियां जहाँ ज़माने गुजारे तूने
वहां तेरे क़दमों की आहत तक नहीं
जिन्हें नाज़ से तू कहता था अपना
अजनबी हैं वो तेरी कमी से भी
जहाँ लौट-लौट जाती है तेरी रूह आज भी
हवाओं ने बिखेर दी तेरी ज़िन्दगी वहीँ
ए बन्दे तू मासूम है आज भी युहीं
वक्त एक रफ्तार है सुम्झा नही कभी
तेरा आशियाँ था जहाँ
वो जहाँ जो तुने संवारा था
वो दुनिया जो तुने बनाई थी
आज तेरा नाम-औ-निशान तक नहीं
तेरे तारीख़ से कोई वाकिफ नहीं
कोई तुझे पहचानता नहीं
तेरी याद को इक लम्हा नहीं
वो गलियां जहाँ ज़माने गुजारे तूने
वहां तेरे क़दमों की आहत तक नहीं
जिन्हें नाज़ से तू कहता था अपना
अजनबी हैं वो तेरी कमी से भी
जहाँ लौट-लौट जाती है तेरी रूह आज भी
हवाओं ने बिखेर दी तेरी ज़िन्दगी वहीँ
ए बन्दे तू मासूम है आज भी युहीं
वक्त एक रफ्तार है सुम्झा नही कभी
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