शनिवार, 22 अक्टूबर 2011

थक गया दिल तुम्हारा



धड़कते धड़कते, आखिर थक ही गया दिल तुम्हारा

चलते चलते, आखिर थम ही गया दिल तुम्हारा

एक पुर्जे की तरह रुकना ही था उसे

रफ़्तार से बहुत तेज़ जो चल रहा था

ये मैं नहीं , वो मशीन बता रही थी

जो तुम्हारे सिरहाने, खामोश लगी थी

हम टकटकी बांधे, उसी को देखते थे

तुम अभी हो, जान कर सुकून पाते थे

मगर जिस घडी दिल ने तुम्हारे जवाब दिया

लकीरें सपाट हो गयीं , चेहरा शांत हो गया

शिकन माथे से गायब हो गयी

तुम्हे जैसे निजात मिल गयी

क्या हश्र किया था तुम्हारा, दवा के ठेकेदारों ने

और हमारी तुम्हे जिंदा रखने की कोशिषों ने

सुईयों से तुम्हारी हर नस खुबो रखी थी

और खुराक के नामपे ट्यूब चढ़ा रखी थी

तुम्हारी बदहवासी की हालत में

जो जी चाह किया बेरेह्मों ने

और हम, सिर्फ हाथ मलते रहे

तुम्हारी एक झलक पाने के लिए

दरबानो से मिन्नतें करते रहे

मगर क्या पहरा था उन दरवाज़ों पे

भीक मांगके भी उन्हें लांघ न सके

आखिर मर्ज़ ने ज़िन्दगी को हरा दिया

और तुम ने जहां को अलविदा कह दिया

सोमवार, 17 अक्टूबर 2011

रोज़ मरती हूँ मैं


कितनी जल्दी मिटा दी ज़माने ने तुम्हारी हस्ती

अब तुम्हे पूछता हुआ कोई आता नहीं कभी

जबकि ये घर आज भी वहीँ उसी मुकाम पे है

न कोई ख़त आता है तुम्हारे लिए , न कोई बिल

तुम्हारे फ़ोन की घंटी भी अब बजती नहीं कभी

वोह भी खामोश हो गया, तुम हुए जिस घड़ी

सब अकाउंट बंद हो चुके हैं तुम्हारे नाम के

और उधारी के सब कार्ड भी ब्लाक

तुम्हारे इस दुनिया में न होने का सबूत

लोग मेरी आँखों से लेते क्यों नहीं

सिर्फ सरकारी दस्तावेज़ ही क्यों मांगते है

तुम्हारे न होने  का तकाज़ा मुझसे बार बार करते हैं

वोह जो तुम्हारी ज़िन्दगी के एवाज़ में चेक भेजते हैं

क्यों तुम्हारी रुक्सती का नज़ारा

हर रोज़ दिखाते हैं वोह मुझे

जब मुर्दों को जिया सकते नहीं

जिन्दों  को जीने देते क्यों नहीं

सोमवार, 12 अप्रैल 2010

जन्नत

सिलवटें पड़ चुकीं हैं बिछौने पर मेरे
शिकन से भर गयी है चादर मेरी

निशान हैं ये मेरी बेचैनी के
तुम्हारे आने के नहीं

काश के यूँ ही होता, वो
रौंदना मुहब्बत की आगोश में

वो साँसों की नमी
वो महके हुए बदन

मेरी मुहब्बत में तेरा खो जाना
वो सिहर जाना, वो सिमट जाना

वो गर्मिए दौरा
वो मौसम के गुनाह

सनम, फिर से हों दोबारा
वो हर बहकी हुई खता

वो थक के सो जाना
तेरे बाँहों के दायरे में

सब कुछ जो तुझे दे दिया
वही यार थी मेरी खुदगर्जी

वो गिरफ्तारी थी
मेरे जनत के दिन

शनिवार, 10 अप्रैल 2010

आँगन

पंख मरोड़ के
तोड़ दिया
और चुनौती दी
उड़ सको
तो उड़ जाओ
बहुत ऊँची उड़ाने
भरता था तू
बहुत बलंदियों का
था गुमान
आज चार कदम भी
चल सकता नहीं
मेरी बैसाखी के बिना
फड फडाता
छट पटाता
कितना बेढब लगता है
ये पखेरू
सय्याद कितनी मुगालता
है तुझे अपनी कैद का
हाय कमबख्त तूने
आसमान देखा ही नहीं
ज़मीन पे था
तो क्या गम था
पींग न भर सका
तो इतना मलाल क्या
बेजुबान से कहता है
ज़रा उड़ के तो दिखा
इस आँगन के बाहर

मंगलवार, 16 मार्च 2010

रिश्ते

हर रिश्ते का नाम नहीं होता
कुछ बेनाम भी होते हैं
जिनके नाम होते हैं
वो अक्सर नागवार होते हैं
क्यों किसी से लगता है
सदियों की पहचान है
और सदियाँ बितायीं जिनके साथ
वो अनजान लगता हैं
बिन कहे कोई
सब कुछ कह जाता है
और कोई बयानात के बाद
भी कुछ नहीं
किसी को स्पर्श की ज़रुरत नहीं
ममता आँखों से झलका जाता है
निस्वार्थ जिसका आलिंगन हो
कितना मधुर वो सम्बन्ध होता है
जो सिर्फ दे कर कुछ पाता है
उस रिश्ते का क्या नाम होता है
जो दूर रह कर भी तेरे पास है
जो बिन बुलाये भी सुन लेता है
जो तेरे हर मिज़ाज से वाकिफ है
और बिन कहे सब समझ जाता है
जो तेरा होकर भी तेरा नहीं
और जो तेरा न होकर भी तेरा है
क्या ऐसा भी कोई रिश्ता होता है
होता है, मगर बेनाम होता है

बुधवार, 30 सितंबर 2009

बेडियाँ

निकले थे जहाँ से
उन्हीं वीरानियों में लौट आए
खोजते हुए आबादी
उन्हीं उदासियों में लौट आए
उठाये थे कदम
मंजिलों की तरफ़
हाय गुमशुदा हम
उसी दोराहे पे लौट आए
दोस्तों की तालाश में
मयखाने पहुँच गए थे
काँधा ढूँड ते
तेरे दर पे लौट आए
आसमान छूने को
पंख पसारे थे हमने
दामन में कुछ खार
कुछ ज़र्रे बटोर लाये
बेडियों को झटक कर
बढाये थे कदम हमने
दर्द ने नाता न तोडा
सलाखों में लौट आए

सोमवार, 21 सितंबर 2009

सन्नाटे

ज़िन्दगी के सन्नाटे गूंजते हैं
रात की अँधेरी सड़कों से
गश्त लगाती हुई लाठियों के साथ
लावारिस कुत्तों के भौंकने के साथ
बस्तियों से थकी साँसों की बू आती है
गलियों से तनहा रूहों की चीखों के साथ
शहर सो गया दिन के झग-झोर के बाद
मुझे नींद आती नहीं क्यों करवटों के बाद
ज़मानें भर की बेवफ़ाइयां 
एक एक याद आतीं रहीं
हजारों जानने वालों में
एक दोस्त याद आता नहीं
आधी उम्र जो गुज़र चुकी है अपनी
एवाज़ में दिखने को कुछ नहीं
क्या यही है ज़िन्दगी अपनी
यही हस्ती, यही बलंदी अपनी
सुबह से शाम का हो जाना
मेरी उम्र का तमाम हो जाना