सिलवटें पड़ चुकीं हैं बिछौने पर मेरे
शिकन से भर गयी है चादर मेरी
निशान हैं ये मेरी बेचैनी के
तुम्हारे आने के नहीं
काश के यूँ ही होता, वो
रौंदना मुहब्बत की आगोश में
वो साँसों की नमी
वो महके हुए बदन
मेरी मुहब्बत में तेरा खो जाना
वो सिहर जाना, वो सिमट जाना
वो गर्मिए दौरा
वो मौसम के गुनाह
सनम, फिर से हों दोबारा
वो हर बहकी हुई खता
वो थक के सो जाना
तेरे बाँहों के दायरे में
सब कुछ जो तुझे दे दिया
वही यार थी मेरी खुदगर्जी
वो गिरफ्तारी थी
मेरे जनत के दिन
सोमवार, 12 अप्रैल 2010
शनिवार, 10 अप्रैल 2010
आँगन
पंख मरोड़ के
तोड़ दिया
और चुनौती दी
उड़ सको
तो उड़ जाओ
बहुत ऊँची उड़ाने
भरता था तू
बहुत बलंदियों का
था गुमान
आज चार कदम भी
चल सकता नहीं
मेरी बैसाखी के बिना
फड फडाता
छट पटाता
कितना बेढब लगता है
ये पखेरू
सय्याद कितनी मुगालता
है तुझे अपनी कैद का
हाय कमबख्त तूने
आसमान देखा ही नहीं
ज़मीन पे था
तो क्या गम था
पींग न भर सका
तो इतना मलाल क्या
बेजुबान से कहता है
ज़रा उड़ के तो दिखा
इस आँगन के बाहर
तोड़ दिया
और चुनौती दी
उड़ सको
तो उड़ जाओ
बहुत ऊँची उड़ाने
भरता था तू
बहुत बलंदियों का
था गुमान
आज चार कदम भी
चल सकता नहीं
मेरी बैसाखी के बिना
फड फडाता
छट पटाता
कितना बेढब लगता है
ये पखेरू
सय्याद कितनी मुगालता
है तुझे अपनी कैद का
हाय कमबख्त तूने
आसमान देखा ही नहीं
ज़मीन पे था
तो क्या गम था
पींग न भर सका
तो इतना मलाल क्या
बेजुबान से कहता है
ज़रा उड़ के तो दिखा
इस आँगन के बाहर
मंगलवार, 16 मार्च 2010
रिश्ते
हर रिश्ते का नाम नहीं होता
कुछ बेनाम भी होते हैं
जिनके नाम होते हैं
वो अक्सर नागवार होते हैं
क्यों किसी से लगता है
सदियों की पहचान है
और सदियाँ बितायीं जिनके साथ
वो अनजान लगता हैं
बिन कहे कोई
सब कुछ कह जाता है
और कोई बयानात के बाद
भी कुछ नहीं
किसी को स्पर्श की ज़रुरत नहीं
ममता आँखों से झलका जाता है
निस्वार्थ जिसका आलिंगन हो
कितना मधुर वो सम्बन्ध होता है
जो सिर्फ दे कर कुछ पाता है
उस रिश्ते का क्या नाम होता है
जो दूर रह कर भी तेरे पास है
जो बिन बुलाये भी सुन लेता है
जो तेरे हर मिज़ाज से वाकिफ है
और बिन कहे सब समझ जाता है
जो तेरा होकर भी तेरा नहीं
और जो तेरा न होकर भी तेरा है
क्या ऐसा भी कोई रिश्ता होता है
होता है, मगर बेनाम होता है
कुछ बेनाम भी होते हैं
जिनके नाम होते हैं
वो अक्सर नागवार होते हैं
क्यों किसी से लगता है
सदियों की पहचान है
और सदियाँ बितायीं जिनके साथ
वो अनजान लगता हैं
बिन कहे कोई
सब कुछ कह जाता है
और कोई बयानात के बाद
भी कुछ नहीं
किसी को स्पर्श की ज़रुरत नहीं
ममता आँखों से झलका जाता है
निस्वार्थ जिसका आलिंगन हो
कितना मधुर वो सम्बन्ध होता है
जो सिर्फ दे कर कुछ पाता है
उस रिश्ते का क्या नाम होता है
जो दूर रह कर भी तेरे पास है
जो बिन बुलाये भी सुन लेता है
जो तेरे हर मिज़ाज से वाकिफ है
और बिन कहे सब समझ जाता है
जो तेरा होकर भी तेरा नहीं
और जो तेरा न होकर भी तेरा है
क्या ऐसा भी कोई रिश्ता होता है
होता है, मगर बेनाम होता है
बुधवार, 30 सितंबर 2009
बेडियाँ
निकले थे जहाँ से
उन्हीं वीरानियों में लौट आए
खोजते हुए आबादी
उन्हीं उदासियों में लौट आए
उठाये थे कदम
मंजिलों की तरफ़
हाय गुमशुदा हम
उसी दोराहे पे लौट आए
दोस्तों की तालाश में
मयखाने पहुँच गए थे
काँधा ढूँड ते
तेरे दर पे लौट आए
आसमान छूने को
पंख पसारे थे हमने
दामन में कुछ खार
कुछ ज़र्रे बटोर लाये
बेडियों को झटक कर
बढाये थे कदम हमने
दर्द ने नाता न तोडा
सलाखों में लौट आए
उन्हीं वीरानियों में लौट आए
खोजते हुए आबादी
उन्हीं उदासियों में लौट आए
उठाये थे कदम
मंजिलों की तरफ़
हाय गुमशुदा हम
उसी दोराहे पे लौट आए
दोस्तों की तालाश में
मयखाने पहुँच गए थे
काँधा ढूँड ते
तेरे दर पे लौट आए
आसमान छूने को
पंख पसारे थे हमने
दामन में कुछ खार
कुछ ज़र्रे बटोर लाये
बेडियों को झटक कर
बढाये थे कदम हमने
दर्द ने नाता न तोडा
सलाखों में लौट आए
सोमवार, 21 सितंबर 2009
सन्नाटे
ज़िन्दगी के सन्नाटे गूंजते हैं
रात की अँधेरी सड़कों से
गश्त लगाती हुई लाठियों के साथ
लावारिस कुत्तों के भौंकने के साथ
बस्तियों से थकी साँसों की बू आती है
गलियों से तनहा रूहों की चीखों के साथ
शहर सो गया दिन के झग-झोर के बाद
मुझे नींद आती नहीं क्यों करवटों के बाद
ज़मानें भर की बेवफ़ाइयां
एक एक याद आतीं रहीं
हजारों जानने वालों में
एक दोस्त याद आता नहीं
आधी उम्र जो गुज़र चुकी है अपनी
एवाज़ में दिखने को कुछ नहीं
क्या यही है ज़िन्दगी अपनी
यही हस्ती, यही बलंदी अपनी
सुबह से शाम का हो जाना
मेरी उम्र का तमाम हो जाना
रात की अँधेरी सड़कों से
गश्त लगाती हुई लाठियों के साथ
लावारिस कुत्तों के भौंकने के साथ
बस्तियों से थकी साँसों की बू आती है
गलियों से तनहा रूहों की चीखों के साथ
शहर सो गया दिन के झग-झोर के बाद
मुझे नींद आती नहीं क्यों करवटों के बाद
ज़मानें भर की बेवफ़ाइयां
एक एक याद आतीं रहीं
हजारों जानने वालों में
एक दोस्त याद आता नहीं
आधी उम्र जो गुज़र चुकी है अपनी
एवाज़ में दिखने को कुछ नहीं
क्या यही है ज़िन्दगी अपनी
यही हस्ती, यही बलंदी अपनी
सुबह से शाम का हो जाना
मेरी उम्र का तमाम हो जाना
शनिवार, 22 अगस्त 2009
कंकाल
मांस का टुकडा समझ
नोच नोच कर खाया तुमने
अब तो कुछ बचा नहीं
फिर क्यों नहीं छोड़ते उसे
कंकाल से क्या भूख
मरती है किसी की
वो भी जब हर आघात से
आत्मा चीखती है उसकी
शायद तुम ही नहीं सुन पाते
काम ने बधिर जो कर दिया तुम्हे
मगर उसकी आँखें तो
देखी होंगी तुमने
भयभीत, आतंकित
खूंटे से बंधी
न आँगन को लाँघ सकी
न बाघ से बच सकी
नोच नोच कर खाया तुमने
अब तो कुछ बचा नहीं
फिर क्यों नहीं छोड़ते उसे
कंकाल से क्या भूख
मरती है किसी की
वो भी जब हर आघात से
आत्मा चीखती है उसकी
शायद तुम ही नहीं सुन पाते
काम ने बधिर जो कर दिया तुम्हे
मगर उसकी आँखें तो
देखी होंगी तुमने
भयभीत, आतंकित
खूंटे से बंधी
न आँगन को लाँघ सकी
न बाघ से बच सकी
शुक्रवार, 21 अगस्त 2009
वास्ता
तेरे शेहेर में रहते हैं हम आज भी
मगर तुझे याद ही नहीं
तेरी गलियों से आतीं हैं राहें मेरे दर तक
मगर तुझे याद ही नहीं
मेरे कूंचे से गुज़र जाता है तू
मगर बिन सलाम किए
तेरे पाये-चाप को पहचानती हूँ आज भी
मगर तुझे याद ही नहीं
खुदा का वास्ता ले कर
तरके-मुहब्बत की थी हमने मगर
दिल कम्बख्क्त तेरा है आज भी
मगर तुझे याद ही नहीं
किसी गैर के पहलु में
तेरा सर क्यूँ कर हो बेवफा
मैं भी तोह हूँ दामन बिछाए
मगर तुझे याद ही नहीं
सावन फिर से लौटा है मेरे आँगन में
मगर मैं कहाँ और तू कहाँ
भीगी हवाओं से भड़क उठती है आग
मगर तुझे याद ही नहीं
मिल जाता है जब, गैरों की मौजूदगी में
गुज़र जाता है कतरा कर
हर सुबह -शाम गुज़ारी थी हमने साथ साथ
मगर तुझे याद ही नहीं
वक्त जो गुज़ारे थे हमने
क्या उनका ज़रा भी तकाज़ा नहीं
सजा राखी है मैंनेसेज आज भी
मगर तुझे याद ही नहीं
तेरी फितरत ही थी आशिकाना, तू करता क्या
मगर मैंने तोह ईबादत की थी
तुझे याद ही नहीं
किसी अपने से पूछ लेता मेरे हमसफ़र
मेरे घर का पता
तेरे नाम से जानते हैं मुझे आज भी
सिर्फ़ तुझे याद नहीं
मगर तुझे याद ही नहीं
तेरी गलियों से आतीं हैं राहें मेरे दर तक
मगर तुझे याद ही नहीं
मेरे कूंचे से गुज़र जाता है तू
मगर बिन सलाम किए
तेरे पाये-चाप को पहचानती हूँ आज भी
मगर तुझे याद ही नहीं
खुदा का वास्ता ले कर
तरके-मुहब्बत की थी हमने मगर
दिल कम्बख्क्त तेरा है आज भी
मगर तुझे याद ही नहीं
किसी गैर के पहलु में
तेरा सर क्यूँ कर हो बेवफा
मैं भी तोह हूँ दामन बिछाए
मगर तुझे याद ही नहीं
सावन फिर से लौटा है मेरे आँगन में
मगर मैं कहाँ और तू कहाँ
भीगी हवाओं से भड़क उठती है आग
मगर तुझे याद ही नहीं
मिल जाता है जब, गैरों की मौजूदगी में
गुज़र जाता है कतरा कर
हर सुबह -शाम गुज़ारी थी हमने साथ साथ
मगर तुझे याद ही नहीं
वक्त जो गुज़ारे थे हमने
क्या उनका ज़रा भी तकाज़ा नहीं
सजा राखी है मैंनेसेज आज भी
मगर तुझे याद ही नहीं
तेरी फितरत ही थी आशिकाना, तू करता क्या
मगर मैंने तोह ईबादत की थी
तुझे याद ही नहीं
किसी अपने से पूछ लेता मेरे हमसफ़र
मेरे घर का पता
तेरे नाम से जानते हैं मुझे आज भी
सिर्फ़ तुझे याद नहीं
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